
मां.. कहां रखे मेरे जूते मोजे, ये रोज का सवाल है..
सिर्फ ये नहीं, सुबह से शाम तक कौन सा ऐसा काम है जो मां के बिना होता हो रवि का..
यूं कहने को तो रवि सबसे समझदार लड़का है, घर में तीनों भाई बहनों में बड़ा और हमेशा अव्वल आने वाला अपनी क्लास में.. आज से नहीं बल्कि नर्सरी से ही, अब तो वो अपने मेडिकल के आखिरी साल में है।
वैसे वो अपनी मां से बहुत प्यार करता है, लेकिन क्या प्यार करने का यही तरीका सही है, मां अब थोड़ी बूढ़ी हो चली.. ठीक से दिखता भी नहीं और शारीरिक रूप से कुछ कमजोर पहले से.. पर मां का दिल है कि अभी भी वो उसे छोटा बच्चा ही समझती है और शायद हमेशा ऐसा ही समझेगी..
ये सवाल सिर्फ रवि के लिए नहीं, वरन् हर उस बेटे के लिए है जो मां और उसके प्यार के नाम पर आदेश देकर, गुस्सा करके, दूर जाने की धौंस देकर कुछ हद तक प्रताड़ित करते हैं.. हालांकि ये ना तो किसी बेटे को समझ आता है और ना ही मां को खलता है..
पर एक सवाल तो है, थोड़ा कठोर.. थोड़ा उलझा..
क्या रवि कल इस बात को समझ पाएगा, शायद हां जब उसका खुद का बच्चा होगा या फिर कभी नहीं.. लेकिन मां तो हमेशा ऐसी ही रहेगी..
ममता का सागर, त्याग और बलिदान की मूरत, प्यार का अमृत बिखेरती हुई खुशबू
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